सत्संग के समक्ष तो ‘बैकुण्ठ’ की प्राप्ति भी ‘गौण’ः साध्वी सुभाषा भारती
देहरादून,। सत्संग की महिमा इतनी महान है कि संत कबीर जी अपनी वाणी में इसे कुछ इस तरह से प्रस्तुत करते हैं- ‘राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय, जो सुख साधु संग में, सो बैकुंठ न होय।’ इंसान का जीवन जहां एक ओर अनमोल है वहीं दूसरी ओर यह क्षणभंगुर भी है। इसके भीतर अगर मात्र संसार को ही बसाकर चला जाए तो यह निरर्थक ही चला जाता है, और यदि इसके महान लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति को पूर्ण कर लिया जाए तो यह सफल-सार्थक जीवन बन जाता है। महापुरुष कहते हैं- ‘भई प्रापत मानुख देहुरिया, गोबिंद मिलन की ऐहि तेरी बरिया, अवर काज तेरे किते न काम, मिल साध संगत भज केवल नाम।’ भक्ति के बिना, ईश्वरीय प्रेम और उनकी प्राप्ति के बिना मनुष्य को शव के समान कहा गया। सत्संग ईश्वर से मिलने का सटीक मार्ग प्रदान किया करता है।
‘दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान’, देहरादून के आश्रम सभागार में आज साप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। मधुर भजनों की प्रस्तुति देते हुए कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। भजनों की सारगर्भित मिमांसा करते हुए मंच का संचालन ‘सदगुरूदेव श्री आशुतोष महाराज जी’ की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की संयोजिका साध्वी विदुषी अरुणिमा भारती जी के द्वारा किया गया। उन्होंने बताया कि मनुष्य जीवन का वास्तविक लक्ष्य तो है ही ईश्वर की प्राप्ति करना। महापुरुष कहते हैं कि मानव जन्म के भीतर यदि सुन्दर कंठ पाकर भी ईश्वर का गुणगान नहीं किया तो यह कंठ मेंढक की टर्र-टर्र के अतिरिक्त कुछ नहीं। यदि नेत्रों को प्राप्त कर ईश्वरीय दर्शन नहीं किया तो यह नेत्र मोर पंख पर अंकित अंाख के समान है। कहा गया- ‘जिन राम भक्ति हृदय नहीं आनी, जीवित शव समान तेहि प्रानी।’ परम गुरू के ‘ब्रह्मज्ञान’ से ही ईश्वर का ‘साक्षात्कार’ मनुष्य के भीतर हो पाता है। सदगुरू ही शाश्वत परम भक्ति के जनक हुआ करते हैं। बिना भक्ति के जीवन को साध्वी जी ने ठीक इस प्रकार से बताया- ‘भक्ति बिना सब सुख एैसे, लवण बिना बहु व्यंजन जैसे।’ दिव्य गुरू ही वह ‘परम चेतना’ शक्ति होते हैं जो अपने शरणागत की चेतना को जाग्रत कर उसे ईश्वर के साथ जोड़ दिया करते हैं। ईश्वर जहां जीवात्मा को संसार में भेज कर उसे कर्मानुसार फल प्रदान किया करते हैं, वहीं दिव्य गुरू जीव को उसके कर्मों के बंधन से मुक्त करके परमात्मा में ही विलीन कर दिया करते हैं। तभी गुरू की अद्वितीय महिमा पर कहा भी गया- कर्ता करे न कर सके, गुरू करे सो होय, तीन लोक नवखण्ड में गुरू से बड़ा न कोय।
कार्यक्रम में दिव्य गुरूदेव की शिष्या तथा संस्थान की प्रचारिका साध्वी विदुषी सुभाषा भारती ने प्रवचन करते हुए बताया कि मनुष्य अपने जीवन में बड़ी से बड़ी उपलब्धि को आसानी से प्राप्त कर सकता है। धन-वैभव, नाते-रिश्ते, मान-प्रतिष्ठा और यहां तक कि वह चाहे तो स्वर्ग के साथ-साथ ‘बैकुण्ठ’ की प्राप्ति भी सहज ही कर सकता है, लेकिन! पूर्ण गुरू का सत्संग उसके जीवन में आना एक दुर्लभ प्राप्ति है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं- ‘सुत दारा अरू लक्ष्मी, पापी घर भी होय, संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दोय।’ मनुष्य मन की यह विशेषता है कि व्यक्ति जैसा भी संग करता है, जिस भी वातावरण में विचरण करता है उसका प्रभाव इस मन पर अवश्य पड़ता है। दुर्योधन जिसे बचपन में सुयोधन कहा जाता था, यह जब शकुनि की संगत में आया तो दुर्जन बन कर दुर्याधन कहा गया। कैकेई जो कि भगवान श्रीराम को भरत से भी अधिक प्रेम किया करती थी, यह कैकई जब मंथरा के प्रभाव में आई तो वह कर्म कर बैठी जिसने उसे इतिहास में कंलिकत कर दिया। आज भी कोई अपनी संतानों के नाम दुर्योधन य कैकेई नहीं रखते हैं। यह होता है संगत का प्रभाव। सेबों से भरी टोकरी में यदि एक भी सेब सड़ा हुआ होता है तो वह सारे ही सेबों को सड़ा दिया करता है। महापुरूषों ने इसीलिए सत्संग को अनिवार्य बताया है।



