श्रेष्ठ मानवों की ‘दिव्य निर्माणशाला’ है ‘पूर्ण गुरू’ का पावन दरबार : भारती
देहरादून,। ‘दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान’-देहरादून द्वारा आज एक बार फिर से असंख्य भक्तजनों को अपने निरंजनपुर स्थित आश्रम सभागार में ईश्वरीय सदविचारों के द्वारा अभिभूत किया गया। अवसर था, रविवारीय साप्ताहिक सत्संग-प्रवचनों तथा मनभावन भजन-संर्कीतन के कार्यक्रम का। अनेक हृदय को छू लेने वाले मधुर भजनों का गायन करते हुए संस्थान के संगीतज्ञों ने कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। भजनों की विस्तृत मिमांसा करते हुए मंच का संचालन साध्वी विदुषी सुभाषा भारती जी के द्वारा किया गया। उन्होंने संगत को बताया कि एक इंसान अपने भीतर जैसी बातों, जैसे विचारों को भरता जाता है उसकी दिनचर्या, उसके समस्त कार्य व्यवहार उन्हीं के अनुसार संचालित होने लगते हैं। भगवान ने मनुष्य को अनेक सुन्दर और अर्थपूर्ण इंद्रियां ईश्वरीय सुन्दर-प्रेरक विचारों को अपने भीतर उतार लेने के लिए प्रदान की होती हैं। जिव्हा, नेत्र, कर्ण, हस्त, चरण तथा संवेदनशील त्वचा यह सभी ईश्वरीय सूक्ष्म स्पन्दन को अपने भीतर तब सटीकता के साथ संजो लेते है जब जीवन में पूर्ण का दिव्य सत्संग प्राप्त हो जाता है। मायावी विचार जहां निन्दा-चुगली, कामना, क्रोध, लोभ तथा मोहग्रस्त बनाकर जीव को ईश्वर से दूर कर देते हैं, वहीं पूर्ण दरबार से प्राप्त सत्संग मनुष्य को उसके मूल गुणों अर्थात! दया, क्षमा, शील, संतोष, धैर्य के साथ-साथ शुद्धता और सौहार्द इत्यादि से परिपूर्ण बनाता है। सत्संग को इसीलिए महापुरूषों ने ‘कल्पतरू’ कहकर अभिवंदित किया है, एक एैसा कल्पतरू जो मनुष्य के मानसिक विचार और काया दोनों का परिवर्तन कर उसे ईश्वर की दिशा में उत्तरोतर आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण कार्य किया करता है। आज के कार्यक्रम में ‘दिव्य गुरू आशुतोष महाराज’ की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की प्रचारिका साध्वी विदुषी जाह्नवी भारती ने संगत के समक्ष मानवीय जीवन के उन प्रेरक पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला, जिन्हें आर्ष मनीषियों ने मानव जीवन के ‘सोलह संस्कारों’ के रूप में वर्णित कर भारतीय संस्कृति की अनुपम भेंट, मानव समाज़ को प्रदान की हुई है। तीनों ही अवस्थाओं अर्थात जन्म से पूर्व, जन्म के पश्चात तथा जन्म के अंत तक यह सोलह संस्कार अगर आज के प्ररिप्रेक्ष्य में मानव अपने जीवन में अपना ले तो निश्चित रूप से यह विश्व ‘स्वर्ग से सुन्दर’ विश्व बन जाए। साध्वी जी ने संतानोंत्पत्ति के उन गूढ़ शास्त्र-सम्मत पक्षों को उजागर करते हुए बताया कि एक उत्कृष्ट तथा समाज़ के लिए लाभकारी संतान को जन्म देकर माता-पिता अपना प्रभावी योगदान प्रदान कर सकते हैं। शिवाजी महाराज, स्वामी विवेकानन्द, श्री अष्टावक्र जी तथा वीर अभिमन्यु और भक्त प्रह्लाद के भीतर माता के गर्भ में ही उन्नत संस्कारों का बीजारोपण हो गया था जिससे ये महान विभूतियां सदा के लिए अमर हो गईं। ‘विवाह संस्कार’ को एक विशेष ज़िम्मेदारी बताते हुए उन्होंने इसे समाज़ निर्माण में अत्यंत प्रभावशाली बताया।
सदगुरूदेव महाराज जी की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की संयोजिका साध्वी विदुषी अरूणिमा भारती जी ने अपने उदबोधन में उपस्थित भक्तजनों को बताया कि सत्संग की त्रिवेणी में डुबकी लगाने पर अथाह पुण्यों की प्राप्ति तो होती ही है साथ ही यदि अपने जीवन में इन्हें पूर्ण रूपेण उतार लिया जाए तो सम्पूर्ण जीवन ही सुन्दर और प्रेरणादायी बन जाता है। उन्होंने श्रवण कुमार का वृतांत भी सुनाया और कहा कि वास्तव में पुत्र का शास्त्र-सम्मत अर्थ तो यही है जो अपने माता-पिता का नरकों से तारण कर दे। नर्क यही है कि बार-बार चौरासी की अनन्त पीड़ाओं को भोगना और इसी चक्र में निरंतर घूमते रहना। जो पुत्र अपने माता-पिता को पूर्ण गुरू के पावन ‘ब्रह्मज्ञान’ के साथ जोड़ देने में अपनी सेवा देता है, वास्तव में वही पुत्र कहलाने का अधिकारी बन पाता है। सोशल मीडिया पर उन्होंने बताया कि इसका सदुपयोग जहां एक ओर संसार को प्रगति की दिशा में अग्रसर करता है, वहीं दूसरी ओर इसका दुरूपयोग मनुष्य को पतन की खाई में धकेलने का ही काम किया करता है। अनेक सुन्दरतम उदहारणों तथा प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से साध्वी जी ने कहा कि समय का नुकसान ही सबसे बड़ा नुकसान है और ब्रह्मज्ञान के बिना विनाश ही विनाश है। प्रसाद का वितरण करते हुए साप्ताहिक कार्यक्रम को विराम दिया गया।


